अनुसंधान अधिकारी के साथ तत्कालीन एसपी और सीओ बांसवाड़ा के खिलाफ कार्रवाई का आदेश

बांसवाड़ा. विशिष्ट न्यायालय, पोक्सो एक्ट ने नाबालिग के अपहरण और बलात्कार के एक मामले में पुलिस कार्रवाई को गैरकानूनी मानते हुए आरोप साबित नहीं होने पर शुक्रवार को एक युवक को दोषमुक्त किया। फैसले में कोर्ट ने विधिविरुद्ध कार्रवाई पर अनुसंधान अधिकारी, तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और सीओ बांसवाड़ा के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए लिखते हुए पुलिस महानिदेशक जयपुर को निर्णय की प्रति भिजवाने का आदेश दिया। अभियोजन पक्ष के अनुसार प्रकरण में अरथूना क्षेत्र के सागेला निवासी एक युवक पर आरोप था कि 13 जनवरी,2017 की शाम वह 14 वर्षीया किशोरी को बहलाकर बाइक पर ले गया और महीनेभर तक तीन अलग-अलग जगह रखकर बलात्कार किया। किशोरी लापता होने पर 16 जनवरी,2017 को उसके भाई ने एसपी को परिवाद दिया, फिर अपहरण और बलात्कार का आरोप लगाते हुए कार्रवाई नहीं होने पर की शिकायत के साथ 30 जनवरी,2017 को परिवाद दिया। तब निर्देश पाकर पुलिस ने केस दर्ज कर तहकीकात की। मामले में आरोप पत्र दाखिल करने के बाद हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट में अभियोजन की ओर से 15 गवाह और 33 प्रदर्श पेश किए गए।

इसके बाद पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर विशिष्ट न्यायाधीश पोक्सो एक्ट मोहम्मद आरिफ ने पाया कि सीआरपीसी की धारा 161 के बयानों में पीडि़ता द्वारा अपने साथ कोई आपराधिक घटना नहीं होना बताने पर बागीदौरा कोर्ट ने धारा 164 के बयाल लेखबद्ध करने से इनकार कर दिया था। बावजूद इसके महज आरोपी की गिरफ्तारी की मांग और विरोध प्रदर्शन पर पुलिस ने कार्रवाई की। मेडिकल और एफएसएल रिपोर्ट से भी किशोरी के साथ बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई, वहीं उम्र के मामले में अभियोजन के साक्ष्य कथित पीडि़ता को नाबालिग साबित नहीं पाए। इसके बाद भी अनुसंधान अधिकारी सुभाषचंद्र ने पीडि़ता के बताए अनुसार न मौका मुआयना किया, न ही नक्शा मौका बनाया। ऐसे में अनुसंधान अधिकारी की साक्ष्य भी विश्वसनीय नहीं रही। कोर्ट ने अनुसंधान विरोधाभासी होना भांपकर पुलिस अधीक्षक द्वारा कानूनी रायशुमारी के लिए लिखे जाने का जिक्र कर निर्णय में कहा कि पुलिस ने बाद में एडीपी की राय को भी नजरअंदाज कर दिया और चालान पेश किया। कोर्ट ने कहा कि एसपी और सीओ को ज्ञान होने के बावजूद आरोपी के खिलाफ विधि विरुद्ध कार्रवाई हुई है। कोर्ट ने सभी आरोपों से उसको दोषमुक्त किया, वहीं आईओ के साथ तत्कालीन एसपी और सीओ बांसवाड़ा पर कार्रवाई के लिए लिखते हुए एक महीने में इससे अवगत कराने के निर्देश दिए।

जिसको कबूलनामा दिया, उसी को नहीं बनाया गवाह
प्रकरण में चौंकाने वाला तथ्य यह भी रहा कि पत्रावली में कोर्ट के समक्ष पीडि़ता की ओर से दिया वह पत्र भी सामने आया, जिसमें उसने अपने साथ कोई घटना नहीं होना बताते हुए कार्रवाई नहीं चाहने की बात लिखी थी। पीडि़ता ने इसमें बताया कि वह खुद मजदूरी के लिए 13 जनवरी,17 को अहमदाबद गई थी। यह कबूलनामा लेने वाले एएसआई मनोहरसिंह ने भी दस्तखत किए, लेकिन प्रकरण में उसे गवाह ही नहीं बनाया गया। खुद अनुसंधान अधिकारी ने कोर्ट में इस बात की जानकारी से इनकार किया कि फाइल में कागज किसने शामिल किया।

कोर्ट ने माना दुर्भावना से हुई पुलिस की कार्रवाई
कोर्ट ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर 39 पेज के निर्णय में कहा कि पुलिस के समक्ष दिए बयान देखकर जब बागीदौरा कोर्ट ने 164 के बयान नहीं लिए। तब प्रकरण को लेकर बाद में फिर पीडि़ता पर दबाव बनाकर बयान करवाए गए। इसके बाद भी अनुसंधान से अपराध साबित नहीं होने पर भी आरोप पत्र दाखिल किया गया, वहीं तत्कालीन एसपी ने भी दिमाग का इस्तेमाल किए बिना चार्जशीट पेश करने का आदेश जारी कर दिया।



source https://www.patrika.com/banswara-news/order-for-action-against-research-officer-then-sp-and-co-of-banswara-6689742/

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